प्रमाणपत्र की राशि न चुकाने पर, अधिकारी निम्नलिखित तरीकों से वसूली कर सकता है:
यह एक्ट एक क्वासी-न्यायिक प्रक्रिया प्रदान करता है, जिसके तहत बिना सामान्य अदालतों में लंबी कार्यवाही किए, सरकारी बकाया वसूला जा सकता है। इस एक्ट के तहत:
यह एक्ट बिहार और ओडिशा राज्यों में लागू होता है। इसके तहत "पब्लिक डिमांड" को उस शेड्यूल के तहत परिभाषित किया गया है जो एक्ट के साथ संलग्न है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं: U.P. Act XXXII of 1917)।
| सामान्य दीवानी वाद | यह अधिनियम | |--------------------------|------------------| | वाद न्यायालय में दायर किया जाता है। | प्रशासनिक अधिकारी (कलेक्टर/प्रमाणकारी अधिकारी) कार्यवाही करता है। | | प्रक्रिया लंबी (वर्षों लग सकते हैं)। | त्वरित प्रक्रिया (कुछ महीने)। | | शुल्क और वकील की फीस अधिक। | कम खर्चीला, क्योंकि सरकारी अधिकारी कार्यवाही करता है। | | अपील उच्च न्यायालय तक जा सकती है। | अपील राजस्व अधिकारियों (जिला कलेक्टर, आयुक्त) तक सीमित। | | सभी प्रकार के ऋणों पर लागू। | केवल सरकारी बकाया (Public Demands) पर। |
The Bihar and Orissa Public Demand Recovery Act, 1914 (BORPDRA) is a colonial-era statute providing procedures for recovering public dues (taxes, rates, rents, fines, fees) in areas formerly under the Bihar and Orissa province. A Hindi PDF edition is useful for practitioners, revenue officers, students, and citizens who prefer Hindi. U.P. Act XXXII of 1917)।
इस अधिनियम के तहत "लोक मांग" (Public Demand) उन बकाया राशियों को कहा जाता है जो सरकार या सरकारी संस्थाओं को देय हों। उदाहरण के लिए:
नोट: यह अधिनियम बिहार और ओडिशा राज्यों के भीतर ही लागू होता है। अन्य राज्यों के पास अपने अलग-अलग सार्वजनिक मांग वसूली अधिनियम हैं (जैसे U.P. Public Demands Recovery Act, U.P. Act XXXII of 1917)। U.P. Act XXXII of 1917)।
बिना उचित नोटिस दिए कोई वसूली नहीं की जा सकती।
जो अधिकारी इस अधिनियम के तहत सद्भावना (good faith) से कार्य करता है, उसके खिलाफ कोई वाद या फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।