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समय बदलता गया और Musafir Café को भी नए दौर के साथ तालमेल बैठाना पड़ा। पहले कैफे में रेडियो पर लोक‑गाने बजते थे; अब कभी‑कभी लैपटॉप और इंटरनेट के सहारे कहानी‑सत्र, कवि‑ठठ्ठा और युवा पाठक मंडली होती। पर जुगल दा का नियम एक था — हर शाम साढ़े पाँच बजे "कहानी समय" होता — कोई भी आकर अपनी ‑ छोटी या बड़ी ‑ कहानी सुनाता। बच्चों, बुजुर्गों और यात्रियों ने यही न तोड़ा।

एक बार गाँव में बड़ी बारिश आई और रास्ते कट गए। तब कैफे ने अस्थायी शरण और खाना दिया। Musafir Café का चरित्र न केवल सांस्कृतिक बल्कि मानवीय भी बन गया — संकट में सहारा देने वाला स्थान।

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गाँव का नाम सिवानी था — एक नदी के किनारे बसा, जहां पेड़ हवाओं से बातें करते और साँझ में सरसों की पीली चादर हवा में लहरा उठा करती। गाँव की मुख्य सड़क पर, एक पुराना मगर मनमोहक कैफे था — Musafir Café। कैफे के मालिक जुगल दा थे, चालीस के आसपास, सफेद दाढ़ी और हमेशा मुस्कान के साथ। उनका मानना था कि हर चाहने वाला व्यक्ति मुसाफिर है — चाहे रास्ते में हो या अपने ही जीवन के सफर में। इसलिए उन्होंने अपना कैफे Musafir Café नाम दिया था।

कहानी जुगल दा के अतीत से शुरू होती है। वह पहले शहर में काम करते थे, एक छोटी नौकरी में। पर एक दिन नौकरी चली गई और वे आत्मनिरीक्षण के बाद गाँव लौट आए। अपने पिता के पुराने घर को सुधार कर उन्होंने कैफे खोला — एक ऐसा स्थान जहाँ किसी को भी बिना पूछताछ के बैठे रहने, चाय पीने और अपनी कहानी सुनाने की आज़ादी मिलती। कैफे के बीचोंबीच एक बड़ी खिड़की थी जिससे नदी दिखती, और हर सुबह जुगल दा ताज़ा पारोठा और अदरक वाली चाय बनाते।