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Ziyarat E Nahiya In Hindi Access

ज़ियारत-ए-नाहिया (अरबी: زیارة الناحية) एक प्रसिद्ध ज़ियारत (सलाम) है जो हमारे 12वें इमाम, हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) ने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और करबला के शहीदों को संबोधित करते हुए पढ़ी थी। इस ज़ियारत में इमाम हुसैन (अ.स.) की मसीबतों का बयान इतना मार्मिक है कि इसे पढ़ते हुए हर मोमिन की आंखें भर आती हैं।

इस ज़ियारत के दो मुख्य संस्करण हैं:

हालाँकि, जब भी 'ज़ियारत-ए-नाहिया' कहा जाता है, तो इसका मतलब प्रायः उसी प्रसिद्ध ज़ियारत से होता है, जो इमाम-ए-ज़माना (अ.स.) ने तशरीफ़ फरमाई। ziyarat e nahiya in hindi

इस ज़ियारत में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु शामिल हैं:

ज़ियारत ए नहिया (زیارتِ ناحیہ) शia इस्लामी साहित्य में एक विशेष प्रार्थना/ज़ियارت है जो अक्सर मुशाफ़-ए-इमाम(अलैहिबिस्सलाम) और इमाम हुसैन (रज़ि.) की शहादत और उनके साथियों के प्रति श्रद्धा और शोक व्यक्त करने के लिए पढ़ी जाती है। यह नहिया/ज़ियारत अरबी-फ़ारसी-उर्दू परंपरा में मिलती है और हिन्दी बोलने वाले समुदायों में भी फ़ारसी-अरबी मूल के वाक्यों के साथ हिन्दी व्याख्या में प्रचलित है। नीचे इसका ऐतिहासिक, धार्मिक और साहित्यिक पक्ष संक्षेप में प्रस्तुत है। "सलाम हो तुम पर

यह ज़ियारत पहली बार प्रसिद्ध शिया विद्वान, सैय्यद इब्ने ताऊस (र.अ.) की किताब "इक़बालुल आमाल" में मौजूद है। इसके बाद, शेख अब्बास अल-कुम्मी (र.अ.) ने इसे अपनी मशहूर किताब "मफातीहुल जिन्नान" (Mafatih ul Jinnan) में शामिल किया, तब से यह दुनियाभर के शियाओं में बहुत प्रचलित हो गई।

विश्वास के अनुसार, यह ज़ियारत इमाम मेहदी (अ.स.) ने उस समय पढ़ी थी जब वे अपने पितरों के साथ मोहब्बत का इज़हार कर रहे थे। हालाँकि यह ज़ियारत दूर से है (नाहिया का अर्थ होता है - किसी तरफ या दिशा), लेकिन इसमें आध्यात्मिक तौर पर इमाम हुसैन (अ.स.) की मज़ार पर हाज़िर होने का एहसास होता है। "ऐ सलाम हो तुम पर

ज़ियारत-ए-नाहिया पढ़ने के कई उद्देश्य हैं:

"ऐ सलाम हो तुम पर, ऐ अबा अब्दिल्लाह अल-हुसैन (अ.स.)! ऐ मेरे पिता के पिता और ऐ सच्चे इमामों की निगाहों की ठंडक!"

"सलाम हो तुम पर, ऐ खून से लथपथ होंटों वाले, ऐ ऐसे शहीद जिनका काफन (कफन) तक नहीं बन पाया!"

"सलाम हो उन ईमान वालों पर जिन्होंने तुम्हारा साथ दिया और तुम्हारे लिए कुर्बान हो गए।"